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'Sadguru' creates new 'chapters' in book of life: Jahannavi Bharti : Uttarakhand News
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जीवन रूपी पुस्तक में नए 'अध्याय' का सृजन करते हैं 'सद्गुरू': जाह्नवी भारती

देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के सत्संग कार्यक्रम में प्रवचन करते हुए आशुतोष महाराज की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती ने कहा कि मनुष्य यदि अपने जीवन की पुस्तक के पन्नों को पलट कर देखे तो अनेक पन्ने कालिमा से कलुषित नजऱ आएंगें। मनुष्य का जीवन अनेक ताने-बाने में उलझकर अनेक प्रकार के कर्म-संस्कारों में आबद्घ होता चला जाता है। कर्मों का लेखा उसकी जीवन रूपी पुस्तक में अनेक स्याह विषयों का सूत्रपात्र करते जाता है। इन सबसे मनुष्य सर्वथा अनभिज्ञ रहते हुए जीवन रूपी गाड़ी को खींचता रहता है। जीवन की अंतिम बेला जब सामने आन खड़ी होती है तब इस पुस्तक का अनावरण हुआ करता है, तब मनुष्य को अपने कालिमा भरे इतिहास के साथ सामना करना पड़ता है।
इस अंतिम अवस्था में उसके पास सुधार करने का कोई अवसर उपलब्ध नहीं रहता है। यह पुस्तक उसके जीवन के अगले क्रिया-कलापों के निर्धारण में अहम् भूमिका निभाती है। यदि मनुष्य के जीवन में उसके जीते जी किसी पूर्ण महापुरूष का आगमन हो जाए तो उनके माध्यम से वह अपनी जीवन पुस्तक में कलुषित पन्नों को समान्त करते हुए नवीन पुष्ठों का समावेश कर सकता है। वास्तव में ही जीवन रूपी पुस्तक में नए अध्याय का सृजन पूर्ण गुरू ही किया करते हैं, साथ ही वे पुराने पुष्ठों को भी फाड़कर नष्ट कर देने की अद्वितीय क्षमता रखते हैं। गुरू पापों की रेखा के समानान्तर महान पुण्यों की बड़ी रेखा खींच दिया करते हंै जिससे पाप रेखा स्वयं ही छोटी पड़ जाती है। सद्गुरू का मिलना आवागमन का छूट जाना हुआ करता है। ईश्वर से मिलाने का सामथ्र्य केवल और केवल पूर्ण सद्गुरू में ही हुआ करता है। पूर्ण गुरू अपने शरणागत् शिष्य को सनातन वैदिक 'ब्रह्म्ज्ञान' प्रदान कर उसे ईश्वर के संग मिला दिया करते हंै। ईश्वर की शाश्वत् भक्ति जीवन में आते ही शिष्य की जीवन रूपी पुस्तक एक महान शास्त्र के रूप में परिवर्तित होने लगती है। जाह्नवी भारती ने बताया कि लक्ष्य को हासिल कर जब शिष्य पूर्ण गुरू की सेवा में सलंग्र होता है तो भक्त का जीवन भी पूर्णता को प्रान्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि ब्रह्म्लोक तथा विष्णुलोक और शिवलोक के साथ-साथ स्वर्गलोक और यहां तक की बैकुण्ठलोक से भी महान होता है गुरूलोक। गुरूलोक एक एैसा स्थान है जहां पर मनुष्य लोक का सर्वाधिक सम्पूर्ण लक्ष्य पूरा हो जाया करता है। इसी प्रकार शिवलोक की महिमा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि देवाधिदेव महादेव भगवान आशुतोष के शिवलोक में जो महामंत्र सदैव गुंजाएमान रहता है, वह मानव मात्र के परम कल्याण में विशिष्ट भूमिका निभाता है, और वह महामंत्र है- ऊं श्री आशुतोषाय नम:। साधु की संगत अर्थात सत्संग को दुर्लभता की संज्ञा दी गई है क्योंकि साधु की संगत केवल मनुष्य लोक में ही उपलब्ध हुआ करती है और सत्संग ही एक एैसा माध्यम है जिसके द्वारा ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग मनुष्य को प्रान्त हुआ करता है, यह सुविधा स्वर्गलोक में भी उपलब्ध नहीं है। 
 

Update on: 01-01-2018

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